मात्र ₹150 कमाने वाला अखबार बेचने वाला बच्चा कैसे बना करोड़ों की कंपनी का CEO?

JNV Chandrapur & Bhusawal CEO & Founder Health-Tech (Medword Solutions)
Vikram Chunarkar CEO Success Story
"गरीबी का असली मतलब और उसकी भयानक टीस तब समझ में आती है, जब इंसान को रात में भूख के साथ सोना पड़ता है..."

यह दर्द भरे अल्फाज़ हैं नवोदय के पूर्व छात्र और आज एक करोड़ों की हेल्थ-टेक कंपनी के CEO, विक्रम चुनारकर के। आज नवोदय पाठशाला के इस ब्लॉग में हम एक ऐसी कहानी लेकर आए हैं जो उन सभी छात्रों के लिए एक करारा जवाब है जो सोचते हैं कि पैसों और संसाधनों की कमी उनकी सफलता का रास्ता रोक सकती है। यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जो घने अंधेरे से निकला और खुद अपना 'सूरज' बन गया!

मुंबई की चकाचौंध से गांव की मुफलिसी तक

विक्रम का जन्म सपनों के शहर मुंबई (उल्हासनगर) में हुआ था। उनके पिता जहाज (MBPT) में काम करते थे और जिंदगी बड़े आराम से कट रही थी। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। अचानक पिता की नौकरी छूट गई और पूरा परिवार आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरा। उन्हें मजबूरन मुंबई छोड़कर महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के अपने छोटे से गांव 'गोंडपिपरी' लौटना पड़ा।

गांव आते ही हालात इतने बदतर हो गए कि उनके पास किराए के मकान की छोटी सी रकम चुकाने तक के पैसे नहीं होते थे। सिर पर छत नहीं बची, तो मजबूर होकर पूरे परिवार को मामा के घर शिफ्ट होना पड़ा। पिता को जब कोई काम नहीं मिल रहा था, तो घर चलाने और बच्चों का पेट पालने की भारी जिम्मेदारी मां और बहनों के नाजुक कंधों पर आ गई, जो तपती धूप में खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करने लगीं।

₹150 महीने की पगार और ₹10 की दिहाड़ी

तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक छोटे से मासूम बच्चे (विक्रम) को शायद 'गरीबी' शब्द की स्पेलिंग भी नहीं पता थी, लेकिन पेट की आग और घर की लाचारी ने उस बचपन को काम करने पर मजबूर कर दिया।

  • अखबार बेचना: विक्रम ने घर-घर जाकर अखबार बांटने का काम शुरू किया। अलसुबह उठकर मीलों चलने के बाद, उन्हें पूरे महीने के मात्र ₹150 मिलते थे।
  • फ्रूट स्टॉल पर मजदूरी: इसके बाद उन्होंने एक फ्रूट स्टॉल पर भी काम किया। जहाँ दिन भर ग्राहकों की भीड़ संभालने और कड़ी मेहनत के बाद उन्हें सिर्फ ₹10 से ₹15 की दिहाड़ी नसीब होती थी।
  • जंगल से लकड़ियां बीनना: जब इतने से भी काम नहीं चलता था, तो नन्हा विक्रम अपनी मां के साथ खेतों में पसीना बहाने और जंगल से चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां बीनने भी जाता था।

एक लाचार भाई की टीस और गणित का सहारा

भले ही विक्रम स्कूल ठीक से नहीं जा पा रहे थे, लेकिन उनका दिमाग और कैलकुलेशन (गणित) कंप्यूटर से भी तेज था। गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में जब लोग बैलगाड़ी भरकर आम बेचने जाते, तो वे विक्रम को हिसाब-किताब रखने के लिए अपने साथ ले जाते थे। यही विक्रम की एकमात्र पढ़ाई थी।

हालात का दर्द तब और गहरा हो गया, जब उनकी बड़ी बहन की शादी तय हुई। एक भाई के तौर पर विक्रम अपनी बहन की शादी में सिर्फ ₹500 का ही योगदान दे पाए थे। यह वो पल था जिसने विक्रम को अंदर से तोड़ दिया था। विक्रम आज भी नम आंखों से याद करते हैं— "एक वक्त ऐसा लग रहा था कि हमारी जिंदगी एक ऐसी काली रात बन चुकी है, जिसकी शायद कभी कोई सुबह ही नहीं होगी।"

नवोदय विद्यालय: जिंदगी की वो 'उजली सुबह'

किस्मत उसी का साथ देती है जो कभी हार नहीं मानता। विक्रम की मेहनत रंग लाई और अंधेरे में ज्ञान की एक किरण चमकी— उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) में हो गया!

उन्होंने कक्षा 6 से 10 तक JNV चंद्रपुर (2002 - 2007) और कक्षा 11-12 JNV भुसावल (2008 - 2009) से पूरी की। नवोदय ने उस गरीब बच्चे को सिर्फ मुफ्त में बेहतरीन शिक्षा, खाना और छत ही नहीं दी, बल्कि उसे वह प्लेटफार्म दिया जिसने उसे यह सिखाया कि बंद आंखों से बड़े सपने कैसे देखे जाते हैं और खुली आंखों से उन्हें पूरा कैसे किया जाता है। विक्रम बताते हैं कि नवोदय के उस जादुई माहौल ने ही उनके टूटे हुए आत्मविश्वास को फिर से जोड़ा।

₹150 कमाने वाला लड़का बना हेल्थ-टेक कंपनी का मालिक!

कहते हैं न, वक्त बदलते देर नहीं लगती। जिस लड़के ने कभी अपनी भूख मिटाने के लिए ₹10 की दिहाड़ी पर काम किया था, आज वह 'Medword Solutions Private Limited' का फाउंडर और CEO है!

इनकी यह 'हेल्थ-टेक' (Health-Tech) कंपनी आज भारत की सबसे तेजी से उभरने वाली कंपनियों में से एक है। यह कंपनी आज पैन इंडिया (Pan India) स्तर पर 1000 से भी ज्यादा बड़े अस्पतालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। जो हाथ कभी जंगल में लकड़ियां बीना करते थे, आज वही हाथ सैकड़ों लोगों को रोजगार बांट रहे हैं!

"Come to Learn and Go to Serve"

नवोदय विद्यालय का यह ध्येय वाक्य (Motto) विक्रम की जिंदगी का सार बन चुका है। विक्रम आज के युवाओं को यही सशक्त संदेश देते हैं:
"अगर आप दिल लगाकर पढ़ते हैं, तो नवोदय की मिट्टी आपको बहुत आगे ले जा सकती है। पढ़-लिखकर जब आप कामयाब हो जाएं, तो अपने समाज, अपने देश और मानवता की सेवा जरूर करें। आज भी इस देश को अच्छे और सच्चे लोगों की बहुत जरूरत है।"

विक्रम चुनारकर का यह सफर हमें सिखाता है कि अगर सीने में आग और लगन हो, तो 'गरीबी' सिर्फ एक बुरा दौर है, कोई स्थाई मुकाम नहीं। ₹150 से शुरू हुआ सफर आज करोड़ों की कंपनी तक पहुंच चुका है और यह सब मुमकिन हुआ सिर्फ और सिर्फ 'शिक्षा' और 'अटूट मेहनत' की बदौलत!

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