छोटे सपनों से बड़े मुकाम तक: राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित संतोष कुमार चौरसिया की प्रेरक यात्रा
ज्ञान की रोशनी किसी महलों की मोहताज नहीं होती, यह तो उन झोपड़ियों से भी निकल सकती है जहाँ हौसलों के चिराग जलते हों। यह कहानी है उस व्यक्ति की जिसने धूल भरी पगडंडियों से उठकर राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय किया। एक ऐसा शिक्षक जिसने विज्ञान को बंद कमरों से निकालकर बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया।
शुरुआती संघर्ष और ज्ञान की प्यास
वाराणसी जिले का एक छोटा सा गाँव। जहाँ कच्ची दीवारें और संकरी गलियाँ थीं, वहीं एक किसान परिवार में संतोष कुमार चौरसिया का जन्म हुआ। पिता श्री शोभनाथ चौरसिया दिन-रात खेतों में पसीना बहाते और माता श्रीमती धनपत्ति देवी घर की जिम्मेदारियों में जुटी रहतीं। हालात मुश्किल थे, पर माता-पिता की एक सीख संतोष के मन में घर कर गई थी— 'शिक्षा ही वह चाबी है जो हर ताला खोल सकती है।'
गाँव के प्राथमिक विद्यालय बच्छाव में उनकी पढ़ाई शुरू हुई। जब उनके उम्र के बच्चे गलियों में खेल-कूद रहे होते, तब संतोष का मन विज्ञान के छोटे-छोटे प्रयोगों और खोज में लगा रहता। एक किताब के लिए लंबा इंतजार करना आम बात थी, पर इसी इंतजार ने उनके संकल्प को और पक्का कर दिया।
अपनी उच्च शिक्षा (B.Sc, M.Sc, B.Ed) पूरी करने का सफर और भी कठिन था। परिवार की आर्थिक स्थिति आड़े आ रही थी। पिता पर बोझ न पड़े, इसलिए संतोष ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इस कड़े संघर्ष में उनके भाई महेश और बड़ी बहन विमला ने उनका पूरा साथ दिया।
एक शिक्षक के रूप में नए अध्याय की शुरुआत
साल 2007 में उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के राजगढ़ ब्लॉक में एक सहायक शिक्षक के रूप में संतोष सर की पहली नियुक्ति हुई। मात्र दो साल के भीतर ही उन्होंने महसूस कर लिया था कि बच्चों के लिए विज्ञान केवल रटने वाला विषय नहीं होना चाहिए। 2009 उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना जब वे नवोदय विद्यालय समिति (NVS) से जुड़े।
उनकी पहली पोस्टिंग ओडिशा के क्योंझर जिले में हुई। भाषा अनजान थी, पर उन्होंने हार नहीं मानी। बच्चों से ही ओड़िया सीखी और उसी भाषा में उन्हें विज्ञान के रहस्य समझाना शुरू कर दिया। उनके समर्पण को देखकर बच्चे भी विज्ञान की ओर खिंचे चले आए।
चुनौतियों को अवसर में बदला
बाद में जब उनका ट्रांसफर मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले अलीराजपुर में हुआ, तो वहां की चुनौतियां अलग थीं। साक्षरता दर बहुत कम थी और बच्चे विज्ञान से घबराते थे। संतोष सर ने ठान लिया कि अब विज्ञान डरावना नहीं, बल्कि मजेदार बनेगा।
उन्होंने एक अनूठी पहल की— कूड़े और बची हुई सामग्री से विज्ञान के मॉडल और खिलौने बनाना। जल्द ही क्लासरूम प्रयोगशालाओं में बदल गए। उनके इस अनूठे प्रयोग से बच्चों में इतना आत्मविश्वास जगा कि वहां तत्कालीन कलेक्टर श्री गणेश शंकर मिश्रा जी के नेतृत्व में एक 'चंद्रशेखर विज्ञान पार्क' की नींव रखी गई। इस पार्क की सबसे खास बात यह थी कि यहाँ कोई भी मॉडल खरीदा नहीं गया था। हर रविवार को आईटीआई के छात्र और खुद कलेक्टर महोदय संतोष सर के साथ मिलकर मॉडल बनाते थे, जिसे देखकर कोई भी विज्ञान के सिद्धांत सीख सकता था।
किताबों की दुनिया से बाहर निकलता विज्ञान
संतोष सर का तरीका एकदम अलग था। उनके लिए जटिल वैज्ञानिक सिद्धांत केवल रटने के लिए नहीं थे, बल्कि जिंदगी से जुड़े थे। वे अंतरिक्ष मिशनों और भविष्य की तकनीक के माध्यम से बच्चों को प्रेरित करते। उनकी कक्षा एक जादुई दुनिया बन गई थी जहाँ हर दिन एक नया रोमांच होता। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ के कोरबा स्थित पीएम श्री जवाहर नवोदय विद्यालय सलोरा में तैनात हैं और उनका वही मिशन आज भी जारी है।
परिवार का साथ और अंतरराष्ट्रीय पहचान
इस पूरी यात्रा में उनकी पत्नी श्रीमती अंजली चौरसिया का बहुत बड़ा योगदान रहा है। वे स्वयं नवोदय में खेलकूद शिक्षिका हैं और उन्होंने घर की सारी जिम्मेदारियां उठा लीं ताकि संतोष सर पूरी तरह अपने मिशन पर फोकस कर सकें।
संतोष सर की मेहनत रंग लाई और वे PISA कार्यक्रम के मास्टर ट्रेनर बने। साल 2019 में उन्हें इंटरनेशनल टीचर एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत भारत के केवल 10 चयनित शिक्षकों में से एक के रूप में टोक्यो, जापान में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला।
कोविड का संकट और नवाचार
जब कोविड-19 ने दुनिया को घरों में कैद कर दिया, तब शिक्षा पर बड़ा संकट आया। संतोष सर रुके नहीं। उन्होंने अपनी शैक्षिक वेबसाइट बनाई, ई-कंटेंट और वीडियो लेक्चर तैयार किए। जब उन्हें लगा कि कई ग्रामीण बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं है, तो वे सीधे PM e-Vidya राष्ट्रीय टीवी चैनल से जुड़ गए और विज्ञान की कक्षाएं टीवी के जरिए हर घर तक पहुंचाईं।
राष्ट्रपति के हाथों सर्वोच्च सम्मान
संतोष सर का मानना है कि नवोदय विद्यालय की धरती बहुत उपजाऊ है; जो शिक्षक यहाँ मेहनत करता है, वह बच्चों के साथ-साथ खुद भी बहुत नाम कमाता है। 2025 में उनकी अथक मेहनत और समर्पण का सबसे बड़ा फल मिला।
भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया। जब उनका नाम राष्ट्रपति भवन में गूंजा, तो वह केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि हर उस छात्र के लिए एक गौरव का क्षण था जिसने उनके मार्गदर्शन में अपने सपनों को पंख दिए थे।
संतोष कुमार चौरसिया की कहानी हमें सिखाती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर इरादे फौलादी हों, तो हर मुश्किल पार की जा सकती है। उनकी यात्रा आज हजारों युवाओं और शिक्षकों के लिए एक जीवंत मिसाल है।
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