चाय की टपरी से 400 करोड़ का विजन: कैसे खड़ा किया 'उत्साह' साम्राज्य

JNV Alumnus Founder: Brand 'Utsah' Entrepreneur
Rajendra Dhanotia Utsah Brand Success Story

क्या कोई गांव का सामान्य सा लड़का, बिना किसी बड़ी पूंजी, गॉडफादर या बिजनेस बैकग्राउंड के, किसी अनजान शहर में जाकर करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर सकता है? अगर आपके मन में भी यह सवाल है, तो इसका जवाब 100% 'हाँ' है!

आज नवोदय पाठशाला के इस ब्लॉग में हम आपके लिए लेकर आए हैं राजेंद्र धनोतिया (राजू भैया) की एक ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी, जो यह साबित करती है कि अगर इंसान में ज़मीनी मेहनत और सही रणनीति (Business Strategy) हो, तो वह झाड़ू लगाने और चाय बेचने से शुरुआत करके भी अपना एक विशाल साम्राज्य बना सकता है। राजेंद्र जी मध्य प्रदेश और राजस्थान के बॉर्डर पर स्थित एक छोटे से गांव 'सेमली' के रहने वाले हैं। उनकी पूरी शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय से हुई और आज वे इंदौर में मशहूर 'उत्साह' (Utsah) ब्रांड (सेमली फूड्स एंड बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड) के डायरेक्टर हैं।

"बिज़नेस पैसों से नहीं, 'उत्साह' और 'दूरदृष्टि' (Vision) से खड़ा होता है।"

नवोदय का वह किस्सा: जिसने बदल दी सोच

जब राजेंद्र नवोदय विद्यालय के हॉस्टल में गए थे, तो शुरुआत में घर की याद आने पर वे और उनके दोस्त अक्सर रात को कंबल ओढ़कर रोया करते थे। एक बार एक बड़े अधिकारी स्कूल के दौरे पर आए और बच्चों ने उनसे यह परेशानी साझा की। तब उस अधिकारी ने एक ऐसी बात कही जो राजेंद्र के दिल में तीर की तरह उतर गई:

"तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे भविष्य के लिए तुमसे कहीं ज्यादा रो रहे हैं। उन्होंने तुम्हें यहाँ भेजकर अपना सब कुछ दांव पर लगाया है, अब तुम्हारी बारी है कि तुम उनके आंसुओं का मोल चुकाओ।"

इस एक लाइन ने राजेंद्र के अंदर ऐसी आग लगाई कि जो लड़का अक्सर बैकबेंचर हुआ करता था, उसने 11वीं और 12वीं दोनों कक्षाओं में अपने स्कूल को टॉप कर दिया!

पहली नौकरी: रेलवे स्टेशन के बाहर झाड़ू-पोछा

12वीं पास करने के बाद साल 2001 में राजेंद्र अपने सपनों को उड़ान देने के लिए इंदौर आ गए। उनका सपना कोई मामूली नौकरी करने का नहीं, बल्कि 'नौकरी देने वाला' (Job Creator) बनने का था। लेकिन जेब बिल्कुल खाली थी और शहर पूरी तरह अनजान था।

सीखने की ललक में उन्होंने रेलवे स्टेशन के बाहर एक PCO (STD बूथ) पर काम करना शुरू किया। उनका काम था— दुकान में झाड़ू-पोछा करना और ग्राहकों से बिल लेना। महीने की पगार थी मात्र ₹1200। नवोदय का टॉपर होने के बावजूद उनके मन में कोई शर्म नहीं आई, क्योंकि वह इसे अपनी सफलता की पहली सीढ़ी मानते थे। अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने जल्द ही उस दुकान का पूरा मैनेजमेंट अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद उन्होंने सिम कार्ड (SIM Card) बेचने का काम किया और अपनी आमदनी को बढ़ाया!

रिस्क, स्मार्ट बिजनेस और टपरी की शुरुआत

दिन-रात मेहनत करके कुछ पैसे जमा होने पर राजेंद्र ने थोड़ी बड़ी दुकान (मात्र ₹400 किराए पर) ली। गांव के व्यापारियों को अपनी दुकान पर बुलाकर उन्होंने चाय-नाश्ता बेचना शुरू किया। उनका बिजनेस करने का तरीका बेहद स्मार्ट था, जिसे आज के पढ़े-लिखे MBA वाले भी सलाम करेंगे:

  • कारीगरों की जगह ठेले वालों को मौका: बाजार के बड़े कारीगर महंगे थे, इसलिए उन्होंने सड़क किनारे ठेला लगाने वाले मेहनती लोगों को अपनी दुकान के आगे 6 महीने तक मुफ्त (बिना किराए के) जगह दी। इससे बिना एक रुपया खर्च किए उनकी दुकान पर भारी भीड़ जुटने लगी।
  • रेलवे टिकट काउंटर का मास्टरस्ट्रोक: भीड़ बढ़ाने के लिए उन्होंने रेलवे टिकट काउंटर का लाइसेंस लिया। ग्राहकों को सर्विस देने के लिए उन्होंने स्टेशन के अपंग और जरूरतमंद लोगों को नौकरी पर रखा (₹10,000 महीना + खाना)। देखते ही देखते वे दिन के 4,000 से 5,000 टिकट बेचने लगे।

जब सब कुछ छिन गया और फिर से हुई 'जीरो' से शुरुआत

बिजनेस जब आसमान छू रहा था, तभी नियति ने एक कड़ा इम्तिहान लिया। एक ऐसा वक्त आया जब राजेंद्र को अपनी दोनों किराये की दुकानें अचानक खाली करनी पड़ीं। वे एक ही दिन में एक बड़े व्यापारी से फिर 'जीरो' पर आ गिरे। उनका सारा सालों का सेटअप खत्म हो गया।

लेकिन नवोदय की मिट्टी से बने इस छात्र ने हार मानना नहीं सीखा था। 2018 में उन्होंने अपनी पत्नी और मां के गहने बेचकर और दोस्तों से कर्ज लेकर ₹2.5 करोड़ का एक खाली प्लॉट खरीदा। वहां कोई नया बिजनेस आंख मूंदकर शुरू करने से पहले, इलाके की 'डिमांड और सप्लाई' समझने के लिए उन्होंने मात्र ₹10,000 में एक चाय की टपरी (काउंटर) लगाई। वह खुद चाय बनाते और ग्राहकों से बात करके उनकी जरूरतें समझते। चाय हिट हुई, तो पोहा-नाश्ता शुरू किया और देखते ही देखते नया बिजनेस वापस उसी रफ्तार से दौड़ पड़ा।

'ब्रांड उत्साह' का जन्म और करोड़ों का साम्राज्य

11 नवंबर 2020 को राजेंद्र जी ने अपने उसी प्लॉट पर एक शानदार बिल्डिंग बनाकर, अपने गांव के नाम पर 'सेमली फूड्स एंड बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड' कंपनी की शुरुआत की और 'उत्साह' ब्रांड लॉन्च किया।

5+ बड़े आउटलेट्स (इंदौर)
300+ कर्मचारी (टीम)
₹25 Cr सालाना टर्नओवर
₹10L प्रतिमाह GST भुगतान

आज इंदौर में उनके 5 बड़े रेस्टोरेंट/आउटलेट्स सफलतापूर्वक चल रहे हैं। कोरोना काल (Covid) की भयंकर मंदी को भी उनकी कंपनी ने मात दी। उनकी टीम में आज 300 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। पिछले साल उनका टर्नओवर ₹25 करोड़ रहा। वे हर महीने लगभग ₹25 लाख सैलरी बांटते हैं और सरकार को गर्व से ₹10 लाख GST भरते हैं।

भविष्य का विजन: 2045 का मास्टरप्लान

राजेंद्र जी यहीं रुकने वाले नहीं हैं। उनका लक्ष्य है कि साल 2045 तक वे अपनी कंपनी को ₹1 लाख करोड़ का साम्राज्य बनाएंगे और 2 लाख लोगों को रोजगार देंगे

युवाओं के लिए खुला निमंत्रण

राजेंद्र जी ने देश के युवाओं (विशेषकर नवोदय के छात्रों) के लिए एक बहुत बड़ी बात कही है:
"अगर जीवन में कहीं रास्ते बंद नज़र आएं, तो 'उत्साह' के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले हैं। यहाँ आइए, मैं बिना किसी फीस के आपको बिजनेस करना, मैनेजमेंट और रेस्टोरेंट चलाना सिखाऊंगा।"

राजेंद्र धनोतिया की यह कहानी साबित करती है कि व्यापार करने के लिए करोड़ों रुपये नहीं, बल्कि करोड़ों का विजन होना चाहिए। अगर आप ज़मीन से जुड़कर काम करते हैं और असफलताओं से घबराते नहीं हैं, तो एक छोटी सी चाय की टपरी भी आपको करोड़ों के साम्राज्य का मालिक बना सकती है।

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