अदम्य इच्छाशक्ति का रहस्य: डॉ. प्रवीण यादव की सच्ची कहानी

JNV Agra Village: Kunjakheda (UP) Published: March '26
Dr. Praveen Yadav Success Story

हर किसी की ज़िंदगी में ऐसे पल आते हैं जब हालात साथ नहीं देते, रास्ते बंद से लगते हैं और उम्मीदें डगमगाने लगती हैं। लेकिन वही लोग आगे बढ़ते हैं जो भीतर से हार मानने को तैयार नहीं होते।

"जहाँ हौंसले बुलंद हों, वहाँ रास्ते खुद बनते हैं।
जो पंखों से नहीं, हिम्मत से उड़ते हैं, वही आकाश छूते हैं।”

आज हम आपके साथ एक ऐसे ही नौजवान की सच्ची कहानी साझा कर रहे हैं— जिसने विषम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और अपने जीवन को एक नई दिशा दी।

"जहाँ चाह वहाँ राह" — यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कोई मामूली सा लड़का, एक छोटे से गाँव से उठकर, कैसे तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए डॉक्टर, कोरोना योद्धा और जनसेवक बन जाता है?

कुछ कहानियाँ सिर्फ सुनी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। यह कहानी है उस दीपक की, जो आँधियों से लड़ा, उस नाव की, जो लहरों से टकराई मगर डूबी नहीं, उस बच्चे की – जिसका नाम है प्रवीण यादव।

छोटे गाँव से उठती उम्मीद की लौ

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव, कुआ खेड़ा, जहाँ स्कूल जाना भी किसी सपने जैसा लगता था, वहीं एक बालक प्रवीण, अपनी आँखों में कुछ अलग सपने लेकर बड़ा हो रहा था।

माँ का आँचल बचपन में ही छिन गया, और मामा का साया भी जल्दी ही चला गया। लेकिन जो सबसे बड़ा नुकसान था, वो था — भावनात्मक खालीपन, जिससे एक बच्चा रोज़ लड़ता था।

"वो अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग आते गए और कारवाँ बनता गया...”

इन हालातों में, उनके स्कूल के एक अध्यापक ने उनकी आँखों की चमक पहचान ली। उन्होंने प्रवीण के पिता से कहा — "यह बच्चा साधारण नहीं है। इसे नवोदय विद्यालय में भेजिए।”

और यहीं से प्रवीण की ज़िंदगी ने करवट ली। नवोदय विद्यालय – एक ऐसा स्थान जहाँ साधारण बच्चों में असाधारण प्रतिभा को तराशा जाता है, जहाँ मुफ़्त शिक्षा के साथ उन्हें अनुशासन, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व सिखाया जाता है।

जब प्रवीण का चयन हुआ, तो गाँव में मानो दीपावली मनाई गई! ढोल-नगाड़ों के साथ उसकी विदाई हुई — जैसे कोई दूल्हा बारात लेकर विदा हो रहा हो। उसे लोग प्यार से "छोटा फौजी" कहने लगे।

'जस्ट पास' से टॉपर बनने की उड़ान

नवोदय पहुँचना एक सपना था, लेकिन वहाँ टिकना चुनौती से कम नहीं था। नवोदय की दुनिया अलग थी — अनुशासन, स्पर्धा और नए माहौल में ढलना। दसवीं कक्षा में तो प्रवीण के मार्क्स बस 'जस्ट पास' आए। लेकिन यही वह मोड़ था, जहाँ एक नया प्रवीण जन्म ले रहा था। स्कूल प्रशासन ने विज्ञान देने से इनकार कर दिया, लेकिन प्रवीण ने ठान लिया — "मंजिल मिले या न मिले, रास्ता तो खुद बनाना है!"

"लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"

ग्यारहवीं में उन्होंने किताबों से दोस्ती कर ली और बारहवीं में बायोलॉजी ग्रुप में टॉपर बनकर साबित किया कि 'हार मानना' शब्द उनके शब्दकोश में नहीं है।

डॉक्टर बनने का सपना: आँसुओं से सींचा गया लक्ष्य

अपनों को खोने का ग़म केवल तन से नहीं, मन से भी तोड़ता है। प्रवीण ने सिर्फ अपनों को नहीं खोया था, उन्होंने अपनी मुस्कान, अपनी मासूमियत, अपना बचपन खो दिया था। लेकिन उन्होंने उस पीड़ा को अपनी ताक़त बना लिया। उन्होंने डॉक्टर बनने की कसम खाई — ताकि कोई और माँ, कोई और बच्चा, उस दर्द से न गुज़रे जो उन्होंने जिया।

"जो पीड़ा सह चुका हो, वही असल में संवेदनशील होता है।”

कोटा की कोचिंग मिली, लेकिन जेब में ज्यादा कुछ नहीं था। फ्री फाउंडेशन कोर्स से शुरुआत हुई। पिता ने कहा, “बेटा, डॉक्टरी का खर्चा बहुत है...”, लेकिन प्रवीण के मन में तो बस एक ही पंक्ति गूंज रही थी:

"वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो”

पहली परीक्षा में भौतिकी में नेगेटिव स्कोर आया। खुद पर संदेह हुआ। लेकिन गुरु ने झकझोर कर कहा:
"सपनों को पाने के लिए नींद तो छोड़नी ही पड़ेगी!"

यहीं से जिद और जुनून ने मिलकर एक चिंगारी जलाई — जो अब कभी बुझने वाली नहीं थी।

हर असफलता एक नई सीढ़ी बनी

कभी रैंक अच्छी आई लेकिन काउंसलिंग छूट गई, कभी तबियत ने साथ नहीं दिया, कभी घर की हालत ने। लेकिन हर बार प्रवीण उठे, और पहले से ज्यादा दृढ़ निश्चय के साथ लड़े।

"असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो। क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।"

2009 में आखिरकार वो दिन आया — जब संघर्ष ने मुस्कुराकर कहा: "अब तेरी बारी है!"

CPMT में शानदार रैंक, BHU और AIIMS में सफलता, और अंततः GSVM Medical College, कानपुर में MBBS का सफ़र शुरू हुआ। गाँव का वो लड़का, जो दसवीं में जस्ट पास था — अब डॉक्टर बनने जा रहा था।

MBBS के बाद उनकी पहली पोस्टिंग मथुरा रिफाइनरी में हुई। लेकिन प्रवीण के पिता चाहते थे कि उनका बेटा प्रशासनिक अधिकारी भी बने। पिता के सपनों को पूरा करने के लिए, कठिन परिश्रम करके उन्होंने UPPSC परीक्षा दी और मैनपुरी में चिकित्सा अधिकारी बने।

कोरोना का योद्धा और समाज का सेवक

डॉक्टर बनकर भी प्रवीण का सफर खत्म नहीं हुआ। जो लोग सच्चे दिल से मेहनत करते हैं, जिनके भीतर कुछ बड़ा कर दिखाने का जज़्बा और हौसला होता है - वो कभी थकते नहीं हैं, रुकते नहीं हैं।

कोरोना के अंधेरे में जब लोग घरों में बंद थे, हर गली सुनसान थी, ज़िंदगी जैसे घर की चारदीवारी में क़ैद हो गई थी। स्कूल, बाज़ार, मंदिर सब बंद थे, बस साथ थी तो-डर और दूरी। तब प्रवीण PPE किट पहनकर गलियों में घूम रहे थे।

पहले मरीज की पहचान, तीन महीने तक घर न जाना, दिन-रात सेवा — यही उनका धर्म बन गया। लोगों ने छतों से फूल बरसाए, तालियाँ बजाईं — वह डॉक्टर नहीं, गाँव के बेटे थे जो सबकी ढाल बनकर खड़े थे।

उनके प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। उन्हें NHM (नेशनल हेल्थ मिशन) से कई सम्मान मिले, खासकर मातृ-शिशु स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में।

‘दीप से दीप जले’: गाँव के लिए समर्पित जीवन

आज भी वे हर सप्ताह गाँव में फ्री हेल्थ कैंप, बच्चों की कोचिंग, खेलकूद का आयोजन करते हैं। 'कुआखेड़ा विकास समिति' के जरिए उन्होंने गाँव को बदलने की ठानी है। उनका मानना है:

"जब एक दीप जलता है, तो सौ और जल सकते हैं!"

उनके प्रयासों से बच्चों को नौकरियाँ मिली हैं, खिलाड़ी राज्य स्तर तक पहुँचे हैं। और हाँ, उन्होंने आज भी नवोदय को नहीं भुलाया — वहाँ के बच्चों के लिए वे हमेशा तैयार रहते हैं। प्रवीण युवाओं से कहते हैं:

"अपनी कमियों को ढूंढो, उन्हें गले लगाओ, और सुधारो। मोबाइल को व्यसन नहीं, साधन बनाओ। अपने सपनों का चुनाव खुद करो, दूसरों की खुशी के लिए नहीं — खुद को बेहतर बनाने के लिए जियो।"

हर चुनौती में छिपी प्रेरणा

प्रवीण आज भी कहते हैं — "एनर्जी कभी खत्म नहीं होती। उसे सही दिशा दो, तो तुम जो चाहो वो पा सकते हो।"

वो मानते हैं कि भगवान कष्ट उसे ही देता है जिससे वह कुछ बड़ा करवाना चाहता है। उनका संदेश है: "अगर आप जीवन में सफल होने में देर कर रहे हैं, तो चिंता मत कीजिए — शायद भगवान आपके लिए कुछ खास सहेज कर रखे बैठा है।" वे अपने आलोचकों को भी प्रेरणा मानते हैं:

"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।"

जो आपकी निंदा करते हैं, वे ही तो आपको प्रेरित करते हैं, आपके अंदर जुनून जगाते हैं और आपको बेहतर बनने का मौका देते हैं। अंत में वे नवोदय विद्यालय को बार-बार नमन करते हैं। वही स्थान था जिसने उन्हें 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' — त्याग के साथ भोग करने की शिक्षा दी।

आपका संघर्ष ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है। बस, चलते रहिए — मंज़िल खुद पास आ जाएगी।

"करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान।"

प्रवीण यादव की कहानी हमें बताती है कि संघर्ष चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर जिद और जुनून साथ हो, तो मंज़िल दूर नहीं। जिनके इरादों में जान होती है, उन्हें जीतने से कोई नहीं रोक सकता।

आप भी बन सकते हैं प्रवीण, प्रवीण की कहानी कोई परी कथा नहीं है। यह एक सच्ची मिसाल है कि अगर आपके इरादे पक्के हों, तो हालात कभी बाधा नहीं बनते। आपने भी कभी कोई सपना देखा है? तो आज से ही उसके पीछे लग जाइए। हाँ, राह में मुश्किलें आएँगी, लोग हँसेंगे, लेकिन जब आप सफल होंगे तो वही लोग ताली भी बजाएंगे।

क्या आप भी डॉ. प्रवीण की तरह नवोदय का हिस्सा बनना चाहते हैं?

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